Balasore Forest Horror Story: शापित दरवाजे का रहस्य

बालासोर के जंगल के पास चार कॉलेज दोस्तों को बेहद सस्ता घर मिलता है। लेकिन बंद दरवाजा, एक रहस्यमयी कमरा और अमावस्या की डरावनी रात उनकी जिंदगी को ऐसे खौफ में बदल देती है, जिसे वे कभी भूल नहीं पाए।
बालासोर के जंगल का शापित दरवाजा | Balasore Forest Horror Story
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बालासोर के जंगल का शापित दरवाजा | Balasore Forest Horror Story

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कुछ घर ऐसे होते हैं जिन्हें देखते ही मन में एक अजीब-सी बेचैनी पैदा होने लगती है।

बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है।
दीवारें वही, कमरे वही, खिड़कियां वही और दरवाज़े भी बिल्कुल सामान्य।

लेकिन कभी-कभी किसी घर की सबसे डरावनी चीज़ वह नहीं होती जो दिखाई देती है।

बल्कि वह होती है…

जिसे देखने से आपको मना किया गया हो।

यह कहानी चार कॉलेज दोस्तों की है, जिन्हें बालासोर के पास रहने के लिए एक बेहद सस्ता घर मिला था। घर बड़ा था, कमरे पर्याप्त थे और किराया इतना कम था कि चारों दोस्तों को लगा कि उनकी किस्मत खुल गई है।

लेकिन मकान मालिक ने उन्हें सिर्फ एक बात कही थी—

“ऊपर वाली मंज़िल पर कभी मत जाना।”

उस समय चारों ने इस बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया।

उन्हें क्या पता था कि कुछ ही दिनों बाद वही बंद दरवाज़ा उनकी ज़िंदगी की सबसे डरावनी रात का कारण बनने वाला है।

अगर आपको किसी घर में रहने के बदले सिर्फ एक शर्त दी जाए—“ऊपर मत जाना”—तो क्या आप उस शर्त को मानेंगे?


बालासोर में मिला सस्ता घर

यह कहानी एक कॉलेज छात्र की है, जिसे हम यहां रोहन नाम से जानेंगे।

कॉलेज में दाखिला लेने के बाद रोहन को रहने के लिए एक जगह की जरूरत थी। आसपास के हॉस्टल भरे हुए थे और कॉलेज के पास मिलने वाले पीजी भी लगभग खाली नहीं थे।

रोज़ दूर से कॉलेज आना-जाना उसके लिए बहुत मुश्किल था।

इसी दौरान उसकी मुलाकात तीन और छात्रों से हुई—अर्जुन, विवेक और समीर

चारों एक ही कॉलेज में पढ़ते थे और सभी रहने के लिए कमरा तलाश रहे थे।

एक दिन एक स्थानीय दुकानदार ने उन्हें बताया कि सामने वाली गली में एक बड़ा घर खाली है।

घर में कई कमरे थे।

किराया भी चार लोगों के हिसाब से बहुत कम था।

चारों दोस्तों को यह सौदा बिल्कुल सही लगा।

दुकानदार ने उन्हें घर की चाबी दी और कहा कि पहले जाकर घर देख लो।

चारों घर देखने पहुंचे।

जैसे ही उन्होंने घर का दरवाज़ा खोला, सामने एक बड़ा हॉल था। दोनों तरफ कमरे बने हुए थे। रसोई और बाथरूम भी थे।

लेकिन हॉल के एक तरफ बनी सीढ़ियों के ऊपर एक दरवाज़ा था।

वह दरवाज़ा बंद था।

चारों ने मकान मालिक से फोन पर बात की।

मकान मालिक ने किराया बताया और घर में रहने की अनुमति दे दी।

लेकिन फोन काटने से पहले उसने एक बात बहुत सख्त लहजे में कही—

“ऊपर वाली मंज़िल पर मत जाना।”

बस इतना।

उसने कोई कारण नहीं बताया।

चारों दोस्तों ने सोचा कि शायद ऊपर मकान मालिक का सामान रखा होगा।

उन्होंने बात को नजरअंदाज कर दिया।

उन्हें लगा कि जब नीचे इतने कमरे हैं तो ऊपर जाने की जरूरत ही क्या है?

उन्हें नहीं पता था कि यही सोच कुछ दिनों बाद उनके लिए सबसे बड़ी गलती साबित होने वाली थी।


आधी रात को शुरू हुई अजीब आवाज़ें

घर में रहने के शुरुआती दिन बिल्कुल सामान्य थे।

कॉलेज जाना।

दोस्तों के साथ घूमना।

खाना बनाना।

रात को देर तक बातें करना।

सब कुछ ठीक चल रहा था।

फिर एक रात रोहन ने ऊपर से कुछ सुना।

ठक… ठक… ठक…

उसे लगा शायद कोई चीज़ गिर गई होगी।

उसने ध्यान नहीं दिया।

लेकिन अगली रात फिर आवाज़ आई।

इस बार आवाज़ कुछ अलग थी।

ऐसा लग रहा था जैसे कोई ऊपर की मंज़िल पर तेज़ी से दौड़ रहा हो।

धड़… धड़… धड़…

रोहन ने सोचा कि शायद उसे वहम हो रहा है।

लेकिन कुछ समय बाद अर्जुन ने भी वही आवाज़ सुनी।

फिर विवेक और समीर ने भी।

अब चारों को यकीन हो गया था कि आवाज़ सिर्फ उनके दिमाग का भ्रम नहीं थी।

एक रात अर्जुन ने रोहन से पूछा—

“तुमने ऊपर से किसी के दौड़ने की आवाज़ सुनी?”

रोहन ने धीरे से कहा—

“हां।”

फिर अर्जुन ने बताया कि वह कई दिनों से यह आवाज़ सुन रहा था और अब आवाज़ पहले से कहीं ज्यादा तेज़ हो गई थी।

चारों के मन में एक ही सवाल था—

ऊपर आखिर है कौन?


बंद दरवाज़ा तोड़ने का फैसला

चारों ने अंदाजा लगाया कि शायद कोई चोर ऊपर छिपा हुआ है।

या फिर कोई जानवर अंदर चला गया होगा।

उन्होंने तय किया कि आज रात वे पता लगाकर रहेंगे।

सीढ़ियों के पास पहुंचकर उन्होंने देखा कि ऊपर जाने वाला दरवाज़ा अभी भी बंद था।

मकान मालिक ने साफ मना किया था।

लेकिन डर और जिज्ञासा के बीच उस रात जिज्ञासा जीत गई।

उन्होंने हथौड़े से ताला तोड़ दिया।

और यहीं से असली Balasore Forest Horror Story शुरू होती है।

ऊपर की मंज़िल पर पहुंचते ही चारों को अजीब-सी ठंड महसूस हुई।

मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाकर उन्होंने चारों तरफ देखा।

वहां कई कमरे थे।

हर कमरे में धूल जमा थी।

जाले लगे हुए थे।

ऐसा लग रहा था जैसे कई वर्षों से वहां कोई गया ही नहीं हो।

उन्होंने एक-एक करके कमरे खोलने शुरू किए।

पहला कमरा खाली था।

दूसरा भी।

तीसरा भी।

चौथे कमरे में भी कुछ नहीं मिला।

फिर वे गलियारे के बिल्कुल आखिरी कमरे तक पहुंचे।

उन्होंने दरवाज़ा खोला।

और वहां पहुंचकर चारों के होश उड़ गए।


आखिरी कमरा बाकी कमरों से बिल्कुल अलग था

बाकी कमरों में जहां धूल और गंदगी थी, यह कमरा बिल्कुल साफ था।

कमरे में एक बिस्तर था।

सामान व्यवस्थित था।

आईना लगा हुआ था।

ऐसा लग रहा था जैसे कोई अभी भी इस कमरे का इस्तेमाल करता हो।

रोहन ने कमरे को देखते हुए कहा—

“शायद मकान मालिक का कमरा होगा।”

अर्जुन ने भी यही सोचा।

उन्होंने पूरे कमरे को देखा।

लेकिन ऊपर दौड़ने वाले व्यक्ति का कोई सुराग नहीं मिला।

अब दोनों वहां से बाहर निकलने लगे।

तभी पीछे से आवाज़ आई—

“तुम लोग इस कमरे के बारे में कुछ नहीं बोलोगे?”

दोनों अचानक रुक गए।

उन्होंने पीछे मुड़कर देखा।

वह आवाज़ उनके दोस्त समीर की थी।

लेकिन…

समीर तो नीचे बाथरूम में गया था।

रोहन ने हैरानी से पूछा—

“तुम यहां कब आए?”

कोई जवाब नहीं मिला।

उन्होंने फिर कमरे के अंदर देखा।

और अगले ही पल जो उन्होंने देखा, उससे उनके शरीर में जैसे खून जम गया।

अभी कुछ सेकंड पहले तक साफ दिखाई देने वाला कमरा अचानक पूरी तरह बदला हुआ था।

हर तरफ धूल थी।

गंदगी थी।

कमरे से सड़ी हुई चीज़ जैसी बदबू आ रही थी।

और फिर उनकी नजर कमरे के एक कोने में गई।

वहां एक युवती बैठी थी।


लाल शादी के कपड़ों में बैठी वह औरत

वह युवती लकड़ी के एक पुराने रैक पर बैठी थी।

उसका सिर नीचे झुका हुआ था।

लंबे काले बाल उसके चेहरे को पूरी तरह ढक रहे थे।

उसने लाल रंग के शादी के कपड़े पहन रखे थे।

उसके पैरों में लाल रंग का आलता लगा हुआ था।

कुछ सेकंड तक दोनों सिर्फ उसे देखते रहे।

वह बिल्कुल शांत बैठी थी।

न कोई हरकत।

न कोई आवाज़।

फिर अचानक रोहन डर के मारे बेहोश होकर गिर पड़ा।

अर्जुन उसे उठाने के लिए नीचे झुका।

और तभी—

वह औरत ऊपर से सीधे रोहन के शरीर पर कूद गई।

अर्जुन के मुंह से चीख निकल गई।

उसने डर के मारे पीछे देखा।

लेकिन अगले ही पल वहां कोई नहीं था।

वह औरत गायब हो चुकी थी।

अर्जुन ने रोहन को उठाया और दोनों कमरे से बाहर भागे।

सीढ़ियों से नीचे उतरते समय रोहन का पैर फिसल गया।

उसके सिर और हाथ में चोट लगी और खून निकलने लगा।

दोनों किसी तरह नीचे पहुंचे।


उस रात आईने में दिखाई दी असली डरावनी चीज़

Balasore Forest Horror Story: शापित दरवाजे का रहस्य

चारों दोस्तों ने तय किया कि वे सुबह होते ही यह घर छोड़ देंगे।

लेकिन उस रात उन्हें एक ही कमरे में सोना पड़ा।

कमरे में एक छोटा-सा लाल बल्ब जल रहा था।

बिस्तर के सामने एक बड़ा ड्रेसिंग मिरर था।

करीब 2:50 बजे रात तक चारों किसी तरह शांत हुए और सो गए।

लेकिन थोड़ी देर बाद रोहन की नींद खुल गई।

कमरे में एक भयानक बदबू फैल रही थी।

ऐसा लग रहा था जैसे कहीं कोई सड़ी हुई लाश पड़ी हो।

फिर उसे अचानक बहुत ज्यादा ठंड महसूस हुई।

इतनी ठंड कि उसे लगा जैसे उसे किसी ठंडे कमरे में डाल दिया गया हो।

कमरे में एसी नहीं था।

खिड़की भी बंद थी।

फिर उसकी नजर सामने लगे आईने पर गई।

और जो उसने आईने में देखा…

वह उसकी जिंदगी का सबसे डरावना दृश्य था।

वही औरत रोहन के शरीर पर बैठी थी।

उसके बाल बिखरे हुए थे।

उसकी आंखें लाल थीं।

और वह सीधे आईने के जरिए रोहन को देख रही थी।

रोहन का पूरा शरीर जैसे जम गया।

वह चाहकर भी हिल नहीं पा रहा था।

तभी उस औरत ने दूसरी भाषा में उससे बात करनी शुरू की।

उसने चेतावनी दी कि उन्होंने उसके कमरे में प्रवेश करके गलती की है।

फिर उसने कहा कि वह रोहन को अमावस्या की रात अपने साथ ले जाएगी।

और फिर…

वह अचानक गायब हो गई।

रोहन चीखते हुए बिस्तर पर उठ बैठा।


दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी

उसकी चीख सुनकर अर्जुन और विवेक भी जाग गए।

उन्होंने पूछा कि क्या हुआ।

रोहन ने कांपती आवाज़ में सब कुछ बताया।

तभी उन्होंने देखा कि रोहन का शरीर असामान्य रूप से काला पड़ता जा रहा था।

और उसी समय कमरे की बिजली चली गई।

चारों तरफ अंधेरा हो गया।

फिर दरवाज़े पर दस्तक हुई।

ठक… ठक… ठक…

कोई बाहर था।

तीनों दोस्त दरवाज़े को घूर रहे थे।

फिर बाहर से एक लड़की की आवाज़ आई—

“रोहन… मेरे साथ चलो।”

और तभी रोहन, जो कुछ देर पहले बिल्कुल शांत पड़ा था, अचानक उठ बैठा।

वह दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगा।

उसके दोस्तों ने उसे पकड़ लिया।

रोहन जोर-जोर से चिल्लाने लगा—

“मुझे छोड़ दो! वो मुझे बुला रही है। मुझे उसके पास जाना है।”

उसकी ताकत अचानक इतनी बढ़ गई कि तीनों दोस्त उसे पकड़ नहीं पा रहे थे।

किसी तरह उन्होंने उसे नीचे गिराकर पकड़ लिया।

बाहर से फिर आवाज़ आई—

“उसे जाने दो।”

कुछ देर बाद वही आवाज़ गुस्से में बदल गई।

“अगर उसे नहीं छोड़ा तो तुम लोग भी नहीं बचोगे।”

तीनों दोस्तों ने डर के बीच हनुमान चालीसा पढ़ना शुरू कर दिया।

कुछ मिनट बाद…

दस्तक बंद हो गई।

आवाज़ भी गायब हो गई।

सुबह होते ही चारों अपना सामान लेकर उस घर से निकल गए।

उन्हें लगा कि अब सब खत्म हो चुका है।

लेकिन असली डर अभी बाकी था।


नई जगह जाने के बाद भी पीछा नहीं छूटा

चारों दोस्तों ने बालासोर में दूसरी जगह पीजी ले लिया।

उन्होंने अपने परिवारों को इस घटना के बारे में कुछ नहीं बताया।

कुछ दिनों तक सब सामान्य रहा।

फिर कॉलेज में छुट्टियां होने वाली थीं।

चारों ने एक छोटी-सी यात्रा पर जाने का फैसला किया।

वे जंगल और पहाड़ी इलाके में घूमने और कैंपिंग करने वाले थे।

उन्हें लगा कि शायद यह यात्रा उन्हें उस डरावनी घटना को भूलने में मदद करेगी।

लेकिन यात्रा की तैयारी के दौरान रोहन का व्यवहार बदलने लगा।

उसकी आंखें लाल दिखाई देने लगीं।

वह बहुत कम बोलता था।

उसका चेहरा भावहीन रहने लगा।

और फिर एक दिन तीनों दोस्त खाने के लिए होटल गए।

वहां रोहन ने अचानक चिकन मांग लिया।

उसने बहुत तेजी से खाना शुरू कर दिया।

एक प्लेट खत्म की।

फिर दूसरी।

फिर तीसरी।

दोस्त एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

उन्हें समझ आ गया कि मामला सामान्य नहीं है।


अमावस्या से दो दिन पहले फिर दिखाई दी वह औरत

उस रात करीब तीन बजे विवेक की नींद खुली।

कमरे का दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था।

दरवाज़े के बाहर रोहन खड़ा था।

उसकी आंखें लाल थीं।

चेहरा अजीब तरीके से काला दिखाई दे रहा था।

उसने खिड़की की तरफ इशारा किया।

“वो मुझे बुला रही है।”

दोनों ने खिड़की की तरफ देखा।

और वहां…

वही औरत खड़ी थी।

वही लाल कपड़े।

वही डरावनी मुस्कान।

तभी उन्हें याद आया—

उसने कहा था कि वह रोहन को अमावस्या की रात अपने साथ ले जाएगी।

उन्होंने इंटरनेट पर देखा।

अमावस्या आने में सिर्फ दो दिन बाकी थे।

दोनों ने रोहन को कमरे में बंद कर दिया।

उसने पूरी रात दरवाज़ा पीटा।

लेकिन उन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला।

सुबह उन्होंने बाकी दोस्त को बुलाया और फैसला किया कि रोहन को उसके परिवार के पास ले जाना ही होगा।


जंगल के बीच अचानक कार से कूद गया रोहन

अगले दिन चारों कार से निकल पड़े।

रास्ता लगभग 70–75 किलोमीटर का था।

शाम होने लगी थी।

सड़क के आसपास जंगल का इलाका था।

करीब छह बजे उन्होंने कार रोकी।

इसी दौरान रोहन ने अचानक कहा—

“पिकनिक कब आएगी? मुझे चिकन खाना है।”

कुछ देर बाद उसने कार की डिग्गी खोली।

वहां रखा कच्चा चिकन निकाल लिया।

और जंगल के किनारे बैठकर उसे खाने लगा।

तीनों दोस्त डर के मारे उसे देखते रहे।

किसी ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की।

वह खाना खत्म करके वापस कार में बैठ गया।

करीब आधे घंटे बाद अचानक वह जोर-जोर से हंसने लगा।

उसकी आवाज़ अब उसकी अपनी आवाज़ जैसी नहीं थी।

वह किसी औरत की आवाज़ में बोल रहा था।

फिर अचानक उसने चलती कार का दरवाज़ा खोला…

और बाहर कूद गया।

कार रोकते ही तीनों दोस्त उसके पीछे भागे।

उन्होंने देखा कि रोहन सड़क के किनारे घायल पड़ा था।

लेकिन इससे पहले कि वे उसके पास पहुंचते, वह उठकर जंगल की तरफ जाने लगा।

तीनों दोस्तों के सामने अब एक भयानक फैसला था।

क्या वे अपने दोस्त को जंगल में छोड़ दें?

या उसके पीछे जाएं?

उन्होंने दोस्ती चुनी।

और जंगल में उतर गए।


पेड़ की डाल पर बैठा था वह

अमावस्या से ठीक एक दिन पहले जंगल में लगभग अंधेरा छा चुका था।

चांद की रोशनी बहुत कम थी।

तीनों मोबाइल की फ्लैशलाइट से रोहन को ढूंढ रहे थे।

तभी अचानक एक पत्थर आकर अर्जुन के सिर पर लगा।

तीनों ने तुरंत टॉर्च उस दिशा में की।

और ऊपर देखा।

एक पेड़ की मोटी डाल पर रोहन बैठा था।

उसका शरीर चोटों से भरा था।

चेहरे पर खून लगा था।

आंखें लाल थीं।

और अंधेरे में उसकी आंखें किसी जानवर की आंखों जैसी चमक रही थीं।

वह ऊपर से उन्हें देख रहा था।

फिर उसी औरत की आवाज़ में बोला—

“तुम लोग उसे मेरे घर से निकालकर ले जा रहे हो?”

तीनों के पैरों तले जमीन खिसक गई।

उन्होंने उससे विनती की।

कहा कि वे कभी उस घर में वापस नहीं जाएंगे।

लेकिन रोहन ने एक ही बात कही—

“मेरे लिए लाल साड़ी लाओ।”

इसके बाद वह एक डाल से दूसरी डाल पर कूदने लगा।

कुछ देर बाद उसका पैर फिसला और वह नीचे गिर गया।

दोस्तों ने किसी तरह उसे पकड़ लिया और सड़क तक लाए।

लेकिन कार वहां पहुंचते ही एक और समस्या सामने आ गई।

कार स्टार्ट नहीं हो रही थी।

उन्होंने कई बार कोशिश की।

इंजन चालू नहीं हुआ।

तभी अचानक कार की छत पर कोई भारी चीज़ गिरी।

पूरी कार हिल गई।

ऊपर से आवाज़ आई—

“मैं इसे अपने साथ लेकर जाऊंगी। तुम इसे नहीं बचा सकते।”

तीनों दोस्तों ने डर के बीच भगवान हनुमान और भगवान जगन्नाथ का नाम लेना शुरू किया।

उन्होंने फिर कार स्टार्ट की।

इस बार इंजन चालू हो गया।

उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।


अस्पताल में भी नहीं रुका डर

वे रोहन को लेकर उसके परिवार के पास पहुंचे।

उसकी हालत बहुत खराब थी।

उसे अस्पताल ले जाया गया।

डॉक्टरों ने तुरंत इलाज शुरू किया।

इस दौरान परिवार ने एक धार्मिक गुरु से भी संपर्क किया।

गुरु ने पूजा की तैयारी शुरू की।

बताया गया कि घटना उस पुराने घर से जुड़ी हो सकती है।

रात में पूजा के दौरान कमरे को बंद कर दिया गया।

अंदर हवन चल रहा था।

मंत्रों का जाप हो रहा था।

और दावा किया गया कि उसी दौरान वही महिला वहां दिखाई दी।

उससे पूछा गया—

“तुम इस लड़के के पीछे क्यों पड़ी हो?”

कहा गया कि महिला ने जवाब दिया—

“यह मेरे कमरे में क्यों आया था?”

गुरु ने उससे रोहन को छोड़ने की विनती की।

दोस्तों ने भी माफी मांगी।

लेकिन वह नहीं मानी।

उसे लाल साड़ी दी गई।

फिर भी उसने रोहन को छोड़ने से इनकार कर दिया।

आखिरकार गुरु ने कहा कि जिस पुराने घर में यह सब शुरू हुआ था, वहां की मिट्टी चाहिए।

रात में ही तीन लोग उस पुराने घर की ओर निकल पड़े।


वही पुराना घर और आखिरी कोशिश

करीब 70–75 किलोमीटर दूर वह पुराना घर था।

रात का समय था।

चारों तरफ सन्नाटा।

घर के पास पहुंचकर उनमें से एक व्यक्ति अंदर गया और मिट्टी लेने लगा।

तभी घर के अंदर से हंसी की आवाज़ सुनाई दी।

वह हंसी ऐसी थी कि बाहर खड़े लोगों के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

किसी तरह मिट्टी लेकर वे वापस लौटे।

सुबह होने में कुछ ही समय बचा था।

घर पहुंचते ही पूजा फिर शुरू की गई।

सबकी नजर घड़ी पर थी।

उम्मीद थी कि शायद इससे रोहन बच जाएगा।

लेकिन अस्पताल से अचानक फोन आया।

रोहन की हालत बिगड़ गई थी।

कुछ समय बाद…

उसकी मौत हो गई।

उसके परिवार के लिए यह एक ऐसी खबर थी जिसे स्वीकार करना मुश्किल था।

चार दोस्तों की एक साधारण कॉलेज जिंदगी एक बंद दरवाज़े से शुरू हुई इस डरावनी घटना में खत्म हो चुकी थी।


आखिर उस औरत की सच्चाई क्या थी?

इस कहानी में सबसे बड़ा सवाल यही है—

वह औरत आखिर कौन थी?

मूल घटना के अनुसार इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलता।

यह भी स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं है कि वास्तव में कोई आत्मा या अलौकिक शक्ति इस घटना के पीछे थी।

घटना की कई बातें डर, मानसिक तनाव, दुर्घटना, नींद से जुड़ी घटनाओं या अन्य वास्तविक परिस्थितियों से भी जुड़ी हो सकती हैं।

लेकिन इस कहानी को डरावना बनाने वाली बात कुछ और है।

चार दोस्तों को शुरुआत में सिर्फ एक चेतावनी मिली थी—

ऊपर मत जाना।

उन्होंने वह चेतावनी नहीं मानी।

उन्होंने बंद दरवाज़ा खोला।

और उसी कमरे से शुरू हुआ ऐसा सिलसिला जिसे वे चाहकर भी भूल नहीं सके।


अगर वह दरवाज़ा आज भी बंद हो तो?

कल्पना कीजिए…

रात के करीब तीन बजे हैं।

आप एक पुराने घर में अकेले हैं।

नीचे पूरा घर शांत है।

तभी ऊपर से कदमों की आवाज़ आती है।

पहले धीमी…

फिर तेज़…

फिर ऐसा लगता है जैसे कोई आपके सिर के ठीक ऊपर दौड़ रहा हो।

आप सीढ़ियों के पास जाते हैं।

वहां एक पुराना बंद दरवाज़ा है।

आपको याद आता है कि मकान मालिक ने कहा था—

“इसे कभी मत खोलना।”

फिर अंदर से आवाज़ आती है।

ठक… ठक… ठक…

और उसके बाद किसी महिला की धीमी आवाज़—

“दरवाज़ा खोलो…”

अब सवाल यह नहीं है कि अंदर भूत है या नहीं।

सवाल यह है—

क्या आपके अंदर वह दरवाज़ा खोलने की हिम्मत होगी?

क्योंकि इस Balasore Forest Horror Story की सबसे डरावनी बात शायद वह औरत नहीं थी।

सबसे डरावनी बात थी…

एक ऐसा दरवाज़ा, जिसे किसी वजह से हमेशा के लिए बंद रखा गया था।

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